हेडिंग:पुलिस की 14,560 वर्गफीट जमीन पर मंदिर ट्रस्ट की एंट्री जमीन पर वर्षों से कब्जा, सरकार खामोश! नकटी में चला बुलडोजर, लेकिन थाना की फाइलों में कैद है कार्रवाई,खुद पुलिस ने कराई थी मामला दर्ज

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रायपुर। एक ओर राजधानी के नकटी गांव में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटाने के लिए प्रशासन ने बुलडोजर चला दिया, वहीं दूसरी ओर राजधानी के ही गोलबाजार थाना क्षेत्र में पुलिस विभाग की प्रस्तावित जमीन वर्षों से कथित कब्जे में होने के बावजूद आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।जानकारी के अनुसार, जिस जमीन पर पुलिस थाना और पुलिस कर्मियों के आवास बनाए जाने थे, उस पर व्यापारियों द्वारा कब्जा कर दुकानें संचालित की जा रही हैं। इस मामले में खुद पुलिस ने गोलबाजार थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी जमीन पुलिस को वापस नहीं मिल सकी।बताया जाता है कि पुलिस विभाग ने कई बार संबंधित अधिकारियों और शासन से अपनी प्रस्तावित जमीन वापस दिलाने की मांग की, लेकिन मामला अब तक फाइलों में ही उलझा हुआ है। सवाल यह है कि जब कानून की रक्षा करने वाली पुलिस ही अपनी जमीन नहीं बचा पा रही, तो आम नागरिक को न्याय मिलने की उम्मीद कैसे की जाए?इस बीच, नकटी गांव में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि एक जगह बुलडोजर की कार्रवाई होती है, जबकि दूसरी जगह वर्षों पुराने कब्जे पर शासन-प्रशासन की चुप्पी आखिर क्यों?अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पुलिस की प्रस्तावित जमीन कभी अतिक्रमण मुक्त हो पाएगी, या न्याय की प्रतीक्षा यूं ही जारी रहेगी!

पुलिस लाइन की 14,560 वर्गफीट जमीन पर मंदिर ट्रस्ट की एंट्री! 13 साल पुराने दस्तावेज़ों ने खोले बड़े सवाल

2013 के राजस्व आदेश में पुलिस अधीक्षक ने बताया था सरकारी भूमि, फिर ट्रस्ट संपत्ति कैसे बनी!

मामला जिला न्यायालय तक पहुंचा था।—

राजधानी रायपुर की बहुमूल्य सरकारी जमीन को लेकर पुराने दस्तावेज़ एक बार फिर बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं। वर्ष 2013 के राजस्व आदेश और सार्वजनिक न्यास कार्यालय के रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि मौदहापारा स्थित करीब 14,560 वर्गफीट भूमि को लेकर पुलिस विभाग और मंदिर ट्रस्ट के बीच विवाद सामने आया था।

दस्तावेज़ों के अनुसार, रायपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने सार्वजनिक न्यास पंजीयक को लिखे पत्र में दावा किया था कि यह भूमि वर्ष 1920 के नजूल पट्टे के तहत पुलिस विभाग को आवंटित की गई थी। इसी जमीन पर वर्षों पहले पुलिस विभाग द्वारा श्री शंकरजी सर्वेश्वर मंदिर का निर्माण कराया गया था और मंदिर का संचालन भी पुलिस विभाग के नियंत्रण में होता था।

रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख है कि उक्त परिसर में 23 दुकानों का निर्माण कराया गया था, जिनसे किराया भी लिया जाता था। पुलिस विभाग ने आरोप लगाया था कि 14,560 वर्गफीट सरकारी भूमि को मिथ्या तथ्यों के आधार पर ट्रस्ट की संपत्ति के रूप में दर्ज करा लिया गया, जिस पर संबंधित लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई थी।

दूसरी ओर, सार्वजनिक न्यास पंजीयक के आदेश में उल्लेख है कि यह संपत्ति 09 अक्टूबर 2007 के आदेश के आधार पर पहले ही ट्रस्ट रजिस्टर में दर्ज हो चुकी थी। साथ ही यह भी कहा गया कि मध्यप्रदेश लोक न्यास अधिनियम, 1951 में पुनर्विलोकन का प्रावधान नहीं है। इसलिए विवाद के समाधान के लिए धारा-26 के तहत सक्षम न्यायालय से निर्देश आवश्यक बताए गए और मामला जिला न्यायालय को संदर्भित कर दिया गया।

इन दस्तावेज़ों ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं—यदि जमीन पुलिस विभाग की थी, तो ट्रस्ट के नाम पंजीयन कैसे हुआ?2007 में ट्रस्ट रजिस्टर में दर्ज करने के समय किन दस्तावेज़ों के आधार पर निर्णय लिया गया?इस विवाद का अंतिम न्यायिक फैसला क्या हुआ?यदि मामला लंबित था, तो आगे क्या कार्रवाई हुई?अब जबकि ये पुराने दस्तावेज़ सामने आए हैं, सरकारी भूमि और ट्रस्ट संपत्ति से जुड़े इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग फिर तेज हो सकती है।

(नोट: यह खबर उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर तैयार की गई है। मामले में संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष भी लिया जाना उचित होगा।)

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