राजनांदगांव। पंडवानी की विश्वविख्यात स्वर-सम्राज्ञी पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन से पूरा देश शोक में डूबा है। वहीं उनकी शिष्या एवं रेलवे विभाग में टीआई पदस्थ तरुणा साहू का भावुक श्रद्धांजलि संदेश हर किसी की आंखें नम कर रहा है। उन्होंने कहा, “गुरु माँ… आप सिर्फ मेरी गुरु नहीं थीं, आप मेरी प्रेरणा, मेरी पहचान और मेरी आत्मा की आवाज़ थीं।”तरुणा साहू ने बताया कि रविवार सुबह 3:15 बजे गुरु माँ के निधन का समाचार मिलते ही उन्हें ऐसा लगा जैसे जीवन का एक आधार स्तंभ उनसे बिछड़ गया हो।



उन्होंने कहा कि शब्दों में इस पीड़ा को बयां करना संभव नहीं है।उन्होंने अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए बताया कि जब वह कक्षा छठवीं में थीं, तब जवाहर नवोदय विद्यालय के माध्यम से डॉ. तीजन बाई के प्रशिक्षण शिविर में जाने का अवसर मिला। करीब 100 बच्चों में से पंडवानी सीखने के लिए उनका चयन होना जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य था।तरुणा ने कहा कि गुरु माँ ने उन्हें सिर्फ पंडवानी का गायन नहीं सिखाया, बल्कि समर्पण, अनुशासन, सादगी और जीवन जीने का तरीका भी सिखाया। उनके साथ दिल्ली, भोपाल, उज्जैन के कालिदास समारोह, रायपुर सहित देश के अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर प्रस्तुति देने का अवसर मिला। कई बार एक ही प्रसंग का आधा गायन गुरु माँ करती थीं और आधा वह स्वयं गाती थीं।
उन्होंने कहा, “वे पल मेरे जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर हैं।”भावुक होते हुए तरुणा साहू ने कहा, “यदि मैं कहूँ कि पंडवानी का दूसरा नाम ही तीजन बाई है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। उन्होंने अपनी तपस्या से छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वभर में सम्मान दिलाया और हम जैसे न जाने कितने शिष्यों को नई पहचान दी।”उन्होंने आगे कहा, “गुरु माँ, आपने मुझे केवल कलाकार नहीं बनाया, बल्कि मुझे गढ़ा है। आज मैं जो भी हूँ, उसमें आपके आशीर्वाद, संस्कार और विश्वास का सबसे बड़ा योगदान है। आपकी आवाज़, आपकी सीख और आपका स्नेह हमेशा मेरे साथ रहेगा। आपकी दी हुई पंडवानी की ज्योति को जीवनभर जलाए रखना ही मेरे लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
“तरुणा साहू ने अंत में नम आंखों से अपनी गुरु को नमन करते हुए कहा, “गुरु माँ… आप केवल मेरी गुरु नहीं थीं, आप मेरी पहचान थीं। आपका जाना मेरे जीवन की अपूरणीय क्षति है। ईश्वर आपकी पावन आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।”पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई के निधन के साथ पंडवानी का एक युग भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उनके शिष्यों के दिलों में उनकी कला, उनकी सीख और उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी।