बेमेतरा, 31 मई 2026। खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले बेमेतरा जिले में किसानों के साथ बड़े स्तर पर ठगी की आशंका ने कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के कई गांवों में कथित रूप से ‘बायो डीएपी’ के नाम पर बिना पंजीयन और बिना वैध लाइसेंस वाले उत्पादों की बिक्री की शिकायतें सामने आई हैं।

आरोप है कि डीएपी खाद के विकल्प के रूप में किसानों को करीब 1450 रुपये प्रति बैग की दर से संदिग्ध सामग्री बेची जा रही है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान के साथ फसल उत्पादन प्रभावित होने का खतरा मंडरा रहा है।

जानकारी के अनुसार, मामले की सूचना मिलने पर जिला कृषि व्यापारी संघ के सदस्य और कृषि विभाग का मैदानी अमला विभिन्न गांवों में जांच के लिए पहुंचा।

30 मई को ग्राम भुरकी में जांच के दौरान किसान लखनलाल भारती और सागर भारती के यहां 5 बोरी खाद बरामद होने की जानकारी सामने आई। जांच टीम में वीरेंद्र निर्मलकर, हुलास देवांगन, जावेद मेमन तथा ग्राम सेवक संजय वर्मा मौजूद थे।
‘बायो डीएपी’ का विभाग में कोई पंजीयन नहींकृषि विभाग के अनुसार, बेमेतरा जिले में ‘बायो डीएपी’ नाम से किसी भी उत्पाद का पंजीयन नहीं है।
विभाग का कहना है कि गोपनीय सूचना मिलने के बाद जिला मुख्यालय के आसपास के गांवों में जांच शुरू कर दी गई है और मामले की तहकीकात के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

व्यापारी संघ का बड़ा आरोप :–
विभाग के संरक्षण के बिना संभव नहींजिला कृषि व्यापारी संघ के अध्यक्ष सिद्धिक खान ने आरोप लगाया है कि जिले में अवैध खाद कारोबार विभागीय संरक्षण के बिना संभव नहीं है। उनका कहना है कि पिछले वर्ष भी बिना लाइसेंस और बिना पंजीयन वाले उर्वरकों की बिक्री का मामला सामने आया था। उस दौरान कई जगह छापेमारी हुई, एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन कार्रवाई का परिणाम आज तक सामने नहीं आया।उन्होंने दावा किया कि इस समय हरियाणा से लाकर कथित नकली डीएपी खाद का भंडारण ग्राम सीरवा बांधा में किया गया है, जहां से भुरकी, हाथमुड़ी और बाबा मोहतरा सहित अन्य गांवों में सप्लाई की जा रही है।
हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।कृषि विभाग पर निष्क्रियता के आरोपस्थानीय लोगों और व्यापारी संघ का आरोप है कि कृषि विभाग पिछले चार वर्षों से जिले में पदस्थ अधिकारियों के नेतृत्व में निजी कृषि दुकानों की नियमित जांच और सरप्राइज निरीक्षण तक नहीं कर पाया है।
शिकायत मिलने पर ही कार्रवाई करने और कर्मचारियों की कमी का हवाला देना विभाग का रटा-रटाया जवाब बन गया है।किसानों को सतर्क रहने की सलाहकृषि विशेषज्ञों का कहना है कि डीएपी (डाई अमोनियम फॉस्फेट) एक रासायनिक उर्वरक है, जबकि बायो उत्पादों की प्रकृति अलग होती है। ऐसे में किसी भी उत्पाद को डीएपी का पूर्ण विकल्प बताकर बेचा जाना किसानों को भ्रमित कर सकता है।
बिना प्रमाणित उत्पादों के उपयोग से फसल को आवश्यक पोषण नहीं मिल पाएगा और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।जिला कृषि व्यापारी संघ ने किसानों से केवल अधिकृत विक्रेताओं से खाद खरीदने, पक्का बिल लेने और उत्पाद के पंजीयन व निर्माता कंपनी की जानकारी जांचने की अपील की है।
बड़ा सवाल :-
खरीफ सीजन के ऐन पहले यदि गांव-गांव में कथित रूप से बिना पंजीयन वाले उत्पाद बेचे जा रहे हैं, तो आखिर कृषि विभाग अब तक कार्रवाई क्यों नहीं कर पाया? क्या किसानों की मेहनत और फसल को दांव पर लगाकर कोई बड़ा नेटवर्क सक्रिय है, या फिर जांच के बाद तस्वीर कुछ और सामने आएगी? अब जिले की निगाहें कृषि विभाग की कार्रवाई पर टिकी हैं।