रायपुर : 22मई 2025, बस्तर में पीसीसी चीफ दीपक बैज का बड़ा और अनोखा प्रदर्शन, या यों कहे तो गलत नहीं होगा कि बस्तर की धरती से एक क्रांतिकारी खबर आई है। दीपक बैज का कहना है कि अब सरकार की नीतियाँ न लोक कल्याण से तय होती हैं, न संविधान से यहाँ अब सब कुछ तय होता है… मुर्गा-भात से !
लोहंडीगुड़ा के आदिवासी सरपंच ने जब किसी VIP बेटी-दामाद (राज्य अतिथि) के लिए “Nचिकन, मटन और भात की थाली” सजाने से इनकार किया, तो SDM साहब ने संविधान की जगह कड़ाही गरम कर दी!
दीपक बैज ने कहा कि सी प्रशासन का नया नियम : “जो थाली नहीं सजाएगा, उस पर धाराएं लगाई जाएंगी…।
लोहंडीगुड़ा के एसडीएम नीतीश वर्मा, जो अब शायद, आहार योजना” के नोडल अधिकारी बन चुके हैं, ने चित्रकोट के सरपंच को आदेश दिया – “पंचायत नाके की कमाई से मटन-भात का इंतजाम करो, वरना नाके को ताला लग जाएगा!”
*सरपंच ने भी ऐतिहासिक जवाब दिया -* “हम सरपंच हैं, सरकारी हलवाई नहीं!”
…और इसी जवाब से SDM साहब की भूख मर गई और लोकतंत्र भूना गया।
*नतीजा? पंचायत का नाका बंद :*
* सरपंच और ग्रामीणों पर FIR
* और धाराएं? ऐसी जैसे उन्होंने कोई आतंकवादी साजिश रच दी हो—126(2), 189(2)!
*ये FIR नहीं, ‘भात-प्रेरित बदला’ है…ग्रामीणों का सवाल भी लाजवाब था :* “अगर आपके खास मेहमान को मुर्गा भात चाहिए, तो अपनी जेब से दीजिए… पंचायत कोई कैटरिंग सर्विस नहीं है!”
लेकिन अफसरशाही की भूख तो आदिवासी आत्मसम्मान से बड़ी निकली।
* सवाल पूछने वाले ही दोषी ठहरा दिए गए।
* और स्वागत न करने वाले “गुनहगार” बन गए।
*दीपक बैज का तगड़ा सवाल : घरप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा – “मुख्यमंत्री के बेटी-दामाद हमारे भी हैं, बस्तर में अतिथि को देवता मानते हैं। लेकिन जबरदस्ती चिकन मांगना और इनकार पर एफआईआर ठोक देना—ये कौन सा प्रशासनिक संस्कार है?”
*बैज बोले :* “बस्तर के आदिवासी रसोई के गुलाम नहीं हैं। ये संविधान को थाली में परोसने का प्रदेश नहीं!”
एसडीएम साहब की सफाई भी भाप की तरह उड़ गई :वो बोले—”मैंने तो कुछ कहा ही नहीं था!”