छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिलेगी विशिष्ट पहचान: मंत्री राम विचार नेताम

Chhattisgarh

रायपुर : 2मई 2025/ छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति की जीवंत झलक नवा रायपुर में देखने को मिलेगी। यह संग्रहालय लगभग बनकर तैयार हो चुका है। आदिम जाति कल्याण मंत्री श्री राम विचार नेताम आज इस संग्रहालय का निरीक्षण किया। यह ट्रायबल म्यूजियम छत्तीसगढ़ के जनजातीय जीवन शैली, संस्कृति एवं परंपरा पर आधरित है। एक ही छत के नीचे तैयार हो रहे म्यूजियम में छत्तीसगढ़ के आदिवासियों की संस्कृति एवं परंपरा से पर्यटक रूबरू हो सकेंगे।
मंत्री श्री नेताम ने निरीक्षण के दौरान कहा कि संग्रहालय के मूर्त रूप में आ जाने के बाद निश्चित ही छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक विशिष्ट पहचान मिलेगी। जल्द ही आदिवासियों की जीवन शैलियों पर आधारित म्यूजियम पर्यटकों के लिए समर्पित होगा। इसकी तैयारी विभाग द्वारा की जा रही है। इस मौके पर विभाग के आयुक्त डॉ. सारांश मित्तर, टीआरआई के संचालक जगदीश कुमार सोनकर, उप सचिव  बी.एस. राजपूत, कार्यपालन अभियंता  त्रिदीप चक्रवर्ती सहित विभागीय इंजीनियर और वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

निरीक्षण के दौरान प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने बताया कि म्यूजियम के निर्माण में डिजिटल तकनीक एवं एआई की मदद ली जा रही है। सभी पारंपरिक सामग्रियों का क्यूआर कोड तैयार कराया जा रहा है। इससे क्यूआर कोड को स्कैन करते ही उस विधा-सामग्री की पूरी जानकारी मोबाइल पर देखी जा सकेगी। अर्थात् यह ट्रायबल म्यूजियम आधुनिकता के सभी पहलुओं से सुसज्जित होगा।

गौरतलब है कि यह ट्रायबल म्यूजियम में जनजातीय जीवनशैली, उनके रहन-सहन, निवास गृह, पूजा पद्धति (देवगुड़ी), उनकी वेशभूषा, उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक विशेषताओं को जीवंत प्रदर्शित किया गया है। उल्लेखनीय है कि जनजातियों के लिए वन दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला और सबसे महत्वपूर्ण जीविकोपार्जन का साधन है। छत्तीसगढ़ में 42 प्रकार की जनजातियां मुख्यतः निवास करती है। यहां 44 प्रतिशत से अधिक वन हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 72 लाख की जनजाति जनसंख्या निवासरत है जबकि शहरी क्षेत्रों में लगभग 5 लाख जनजाति जनसंख्या निवास करती है।

आदिवासियों की आजीविका मुख्यतः वनोपज पर निर्भर है। जनजातीय समुदाय का, वनों के संरक्षण और संवर्धन में महती भूमिका है। वे वनोपज और जड़ी बूटियों का उपयोग इस प्रकार करते हैं कि उसके अस्तित्व पर संकट न आये। बैगा आदिवासी कभी साजा का पेड़ नहीं काटते, इसमें वह बूढ़ा देव का वास मानते है प्रकृति और जीवन के बीच आपसी समन्वय जनजाति समाज में गहरी जड़ों तक समाया हुआ है। इस संग्रहालय में आदिवासी समुदाय के इतिहास, परंपराओं, और रीति-रिवाजों के बारे में जानकारी दी गई है। वहीं जनजातीय कलाकृतियाँ, वस्त्र, आभूषण, उपकरण, और अन्य वस्तुएं भी प्रदर्शित कर आदिवासी संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया हैं।

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