रायगढ़ : 19अप्रैल2025, छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में पत्थर, कोयला, बॉक्साइट और लोहे के खनन ने अब सिर्फ जंगलों को ही नहीं निगला इस तथाकथित ‘विकास’ की भूख ने अब समुदायों की जड़ें, संस्कृति, आजीविका और जैव विविधता को भी निगलना शुरू कर दिया है।
(“बिग ब्रेकिंग:जिंदल पावर प्लांट के गारे पेलमा माइंस में ब्लास्टिंग के दौरान हुई दुर्घटनाएक व्यक्ति की हुई मृत्यु, दो घायल, घायलों का जिंदल फोर्टिस रायगढ़ में चल रहा उपचारजिला प्रशासन ने की पुष्टि मृतक के परिवार को जिंदल पावर देगा 50 लाख रुपए, मुआवजा और 20 हजार मासिक पेंशनप्रशासन और पुलिस की टीम ने घटनास्थल का किया निरीक्षण”)
रायगढ़,छालनवापरा रोड,कोरबा, सरगुजा और कांकेर जैसे इलाके अब केवल खनिज संसाधनों के नक्शे नहीं, बल्कि आदिवासी अस्तित्व की रेखाएं हैं जिन्हें DBL, Jindal, Adani, Vedanta जैसी कंपनियां की चलते मिटाने पर तुली हैं।
‘EIA’ रिपोर्ट नहीं, ये तो ‘कॉर्पोरेट माफीनामा’ है : पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) अब एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कंपनियों के लिए ‘क्लीन चिट’ दिलाने वाला दस्तावेज़ बन गया है। इन रिपोर्टों में न जंगलों की सही तस्वीर पेश की जाती है, न वन्यजीवों की वास्तविक उपस्थिति का ज़िक्र होता है। ‘जनसुनवाई’ का नाम लेकर ट्रकों में भरकर लाई गई भीड़ से ‘सहमति’ हासिल की जाती है, जबकि असली प्रभावित समुदायों को या तो बुलाया ही नहीं जाता, या फिर उनकी आवाज़ दबा दी जाती है।
सवाल तो यह है कि क्या केवल पेड़ों की गिनती ही पर्यावरण है : –
सवाल क्ययह है कि क्या विकास का अर्थ सिर्फ पेड़ काटने और खदानें खोदने तक सीमित है!
सवाल यह है कि क्या आदिवासी समाज की आजीविका, उनकी सांस्कृतिक परंपराएं, पवित्र स्थल, जलस्रोत और जैव विविधता कहां लुफ्त हो रहे हैं!
सवाल यह है कि क्या क्यों नहीं की जाती Social Impact Assessment, Livelihood Impact Assessment और Biodiversity Assessment!
अब समय आ गया है कि इन पहलुओं को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया जाए और हर परियोजना से पहले सार्थक जन-सुनवाई सुनिश्चित की जाए, जिसमें प्रभावित लोग खुलकर बोल सकें, सवाल पूछ सकें और सहमति-असहमति दर्ज करा सकें।
*सरकारी संस्थाएं बनीं कॉर्पोरेट एजेंट :* पर्यावरण मंत्रालय से लेकर वन विभाग और जिला प्रशासन तक सब कॉर्पोरेट्स के इशारे पर काम कर रहे हैं। सूत्रों तो यह भी कहते हैं कि जिन परियोजनाओं पर जन असहमति हो , उन्हें भी जबरन मंजूरी दी जा रही है और आंदोलनकारियों को ‘विकास-विरोधी’ घोषित कर उनके खिलाफ दमनात्मक कार्यवाही की जा रही है।
*अब समाज देगा जवाब :* अब आदिवासी समुदाय, जनसंगठन, किसान और पर्यावरण प्रेमी एकजुट होकर सरकार और कंपनियों को खुला संदेश दे रहे हैं कि बिना हमारी सहमति कोई परियोजना नहीं, हमारी ज़मीन, हमारा जंगल, हमारी संस्कृति – अब और लूट नहीं,जनसुनवाई होगी, तो खुले मंच पर और सच के साथ होगी!
आदिवासीयों का कहना है कि यह अंत नहीं, संघर्ष की शुरुआत है , हम विरोध करते हैं और DBL हो या Adani, Vedanta हो या Jindal अब कंपनियों की ‘EIA-जुगाड़’ संस्कृति को जनता बेनकाब करेगी। रायगढ़ से उठी यह आवाज़ अब पूरे देश में गूंजेगी। जनआंदोलन खड़ा होगा।