बिलासपुर | 2 अप्रैल 2026छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को उम्रकैद की सजा सुनाई है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने 2007 में निचली अदालत द्वारा दिए गए बरी के आदेश को रद्द कर दिया।अदालत ने अपने फैसले में अमित जोगी को हत्या की साजिश का मुख्य आरोपी (मास्टरमाइंड) माना। कोर्ट के अनुसार, 4 जून 2003 को रायपुर में एनसीपी नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या की गई थी, जिसके पीछे राजनीतिक रंजिश मुख्य वजह थी।सीबीआई जांच में यह सामने आया कि जग्गी एक बड़ी राजनीतिक रैली की तैयारी कर रहे थे, जिसे तत्कालीन सत्ता के लिए चुनौती माना जा रहा था। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि शुरुआती पुलिस कार्रवाई में फर्जी आरोपियों को गिरफ्तार कर असली अपराधियों को बचाने की कोशिश की गई।हाईकोर्ट ने कहा कि अमित जोगी ने साजिश के तहत शूटरों को बुलाने, ठहराने और घटना के बाद उन्हें पैसे दिलाने में भूमिका निभाई। कोर्ट ने यह भी माना कि अपने प्रभाव के कारण उन्होंने जांच को प्रभावित किया।अदालत ने आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत अमित जोगी को आजीवन कारावास और ₹1,000 जुर्माने की सजा सुनाई है। साथ ही, उन्हें तीन सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया गया है।वहीं, मामले के अन्य आरोपियों—मुख्य शूटर चिमन सिंह समेत—की सजा को भी बरकरार रखा गया है।इस फैसले के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि समान साक्ष्यों के आधार पर किसी प्रभावशाली व्यक्ति को अलग राहत नहीं दी जा सकती।
प्रमुख नोट :-जब सभी आरोपियों पर एक ही अपराध में सहभागिता का आरोप हो, तो किसी विशेष आरोपी के पक्ष में कृत्रिम भेदभाव नहीं किया जा सकता। यदि अभियोजन पक्ष का मामला सभी आरोपियों के विरुद्ध समान साक्ष्यों पर आधारित है, तो उसी साक्ष्य के आधार पर एक आरोपी को बरी करते हुए अन्य को दोषी ठहराना अनुचित होगा, जब तक कि उस आरोपी के पक्ष में स्वतंत्र रूप से बरी करने का कोई ठोस और निर्णायक मामला सिद्ध न हो जाए