रसोई में महंगा तेल, ‘आशीर्वाद’ के दीयों में उजली शाम… रोशनी के बीच महंगाई पर मुस्कुराता सवाल

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व्यंग्य : रायपुर। महंगाई के दौर में रसोई का बजट संभालना आसान नहीं। खाने के तेल की कीमतों पर गृहिणियों की नजर रहती है और हर लीटर का हिसाब घरेलू बजट का हिस्सा होता है। ऐसे में 17 सितंबर को देश – प्रदेशभर में ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान के तहत जब बड़ी संख्या में दीये रोशन हुए, तो इस खूबसूरत रोशनी के साथ एक हल्का-सा सवाल भी सामने आया—रसोई में तेल बूंद-बूंद संभालकर और दीयों में खुलकर… यही तो हमारे उत्सवों का दिलचस्प विरोधाभास है। कहें तो पूरे शासन प्रशासन इस कार्यक्रम को सफल बनाने को पूरी ताकत झोंक दी थी

दीयों की रोशनी ने माहौल को उत्सवी बना दिया। जगह-जगह लोगों ने उत्साह के साथ भागीदारी की और दीप प्रज्ज्वलित किए। निश्चित तौर पर ऐसे आयोजन सामाजिक सहभागिता और सामूहिक उत्सव का भाव मजबूत करते हैं।

लेकिन व्यंग्य की नजर से देखें तो तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है।

घर में जब तेल की बोतल खत्म होने लगती है तो अगली बोतल खरीदने से पहले कीमत जरूर देखी जाती है। वहीं किसी उत्सव में जब वही तेल दीये की लौ बनता है तो उसका हिसाब रुपये-पैसे से ज्यादा भावना में होने लगता है

रसोई में सवाल होता है—“तेल कितना महंगा है?”
दीये के सामने सवाल बदल जाता है—“रोशनी कितनी सुंदर है!”

यही हमारे उत्सवों की खूबसूरती भी है और महंगाई के दौर का दिलचस्प विरोधाभास भी।

कुछ घंटे की लौ, लंबे समय की उम्मीद

एक दीया कुछ समय के लिए अंधेरा दूर करता है, लेकिन उसकी रोशनी उम्मीद का प्रतीक बन जाती है। इसी भावना के साथ ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान को भी देखा जा रहा है।

अब जरूरत इस बात की है कि उत्सव की यह सकारात्मक ऊर्जा रोजमर्रा की जिंदगी में भी दिखाई दे। पक्के मकान की चाह रखने वाले परिवार हों, बेहतर सड़क की उम्मीद रखने वाले गांव हों, अस्पताल और शिक्षा से जुड़ी जरूरतें हों—इन क्षेत्रों में होने वाला हर सकारात्मक बदलाव भी किसी दीये की लौ से कम नहीं होगा।

तेल की कीमत का हिसाब और रोशनी की खुशी

महंगाई के बीच तेल का उपयोग चाहे रसोई में हो या दीये में, दोनों की अपनी जरूरत और अपनी भावना है। एक पेट की जरूरत पूरी करता है, दूसरा मन में उत्सव की भावना जगाता है।

इसलिए सवाल यह नहीं कि दीये क्यों जलाए गए। सवाल इतना भर है कि इन दीयों से निकली सकारात्मक ऊर्जा समाज की दूसरी जरूरतों तक भी कैसे पहुंचे।क्योंकि उत्सव की रोशनी कुछ घंटे रहती है, लेकिन उम्मीद की रोशनी लंबे समय तक चल सकती है।

और शायद यही ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान का सबसे सुंदर संदेश भी हो—दीया सिर्फ घर-आंगन में नहीं, लोगों की जिंदगी में भी उजाला करे।

लेकिन व्यंग्य की नजर से देखें तो तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है।

घर में जब तेल की बोतल खत्म होने लगती है तो अगली बोतल खरीदने से पहले कीमत जरूर देखी जाती है। वहीं किसी उत्सव में जब वही तेल दीये की लौ बनता है तो उसका हिसाब रुपये-पैसे से ज्यादा भावना में होने लगता है।

रसोई में सवाल होता है—“तेल कितना महंगा है?”
दीये के सामने सवाल बदल जाता है—“रोशनी कितनी सुंदर है!”

यही हमारे उत्सवों की खूबसूरती भी है और महंगाई के दौर का दिलचस्प विरोधाभास भी।

कुछ घंटे की लौ, लंबे समय की उम्मीद

एक दीया कुछ समय के लिए अंधेरा दूर करता है, लेकिन उसकी रोशनी उम्मीद का प्रतीक बन जाती है। इसी भावना के साथ ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान को भी देखा जा रहा है।

अब जरूरत इस बात की है कि उत्सव की यह सकारात्मक ऊर्जा रोजमर्रा की जिंदगी में भी दिखाई दे। पक्के मकान की चाह रखने वाले परिवार हों, बेहतर सड़क की उम्मीद रखने वाले गांव हों, अस्पताल और शिक्षा से जुड़ी जरूरतें हों—इन क्षेत्रों में होने वाला हर सकारात्मक बदलाव भी किसी दीये की लौ से कम नहीं होगा।

तेल की कीमत का हिसाब और रोशनी की खुशी

महंगाई के बीच तेल का उपयोग चाहे रसोई में हो या दीये में, दोनों की अपनी जरूरत और अपनी भावना है। एक पेट की जरूरत पूरी करता है, दूसरा मन में उत्सव की भावना जगाता है।

इसलिए सवाल यह नहीं कि दीये क्यों जलाए गए। सवाल इतना भर है कि इन दीयों से निकली सकारात्मक ऊर्जा समाज की दूसरी जरूरतों तक भी कैसे पहुंचे।

क्योंकि उत्सव की रोशनी कुछ घंटे रहती है, लेकिन उम्मीद की रोशनी लंबे समय तक चल सकती है।

और शायद यही ‘आशीर्वाद का दीया’ अभियान का सबसे सुंदर संदेश भी हो—दीया सिर्फ घर-आंगन में नहीं, लोगों की जिंदगी में भी उजाला करे।

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