कोंडागांव: सरगीपालपारा के नजूल भूमि प्रकरण ने अब गंभीर मोड़ ले लिया है। FIR दर्ज होने के बाद मामला न्यायालय तक पहुंच गया है और राजस्व विभाग की कार्रवाई तथा जमीन के रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ता ने लंबे समय से पदस्थ कुछ राजस्व अधिकारियों, पटवारी और आरआई की भूमिका की जांच की मांग की है।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।शिकायतकर्ता का आरोप है कि जिस समय संबंधित जमीन के मालिक बताए जा रहे एक स्वास्थ्य विभाग से सेवानिवृत्त वरिष्ठ नागरिक गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और इलाज के लिए अस्पतालों के चक्कर लगा रहे थे, उसी दौरान जिला प्रशासन कोंडागांव द्वारा जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में कथित तौर पर ऐसी प्रक्रिया शुरू हुई, जिससे विवादित भूमि पर किसी अन्य व्यक्ति के नाम का दावा सामने आया। करीबन 46 साल बाद सरकारी खसरा नंबर से कैसे हुआ नामांतरण ! यह बड़ा सवाल.

मामले का सबसे बड़ा सवाल शासकीय खसरा क्रमांक 513/12 को लेकर है। शिकायतकर्ता का दावा है कि करीब 46 साल बाद सीधे सरकारी खसरा नंबर का उल्लेख करते हुए नामांतरण किया गया। इसी प्रक्रिया को लेकर उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड, पुराने दस्तावेजों और नामांतरण की पूरी फाइल की जांच की मांग की है।शिकायतकर्ता के अनुसार उन्होंने कलेक्टर, अपर कलेक्टर, नजूल अधिकारी, पुलिस अधीक्षक और राजस्व मंत्री सहित संबंधित अधिकारियों को दस्तावेज सौंपे हैं।
उनका दावा है कि राजस्व मंत्री ने दस्तावेज देखने के बाद कोंडागांव कलेक्टर से दूरभाष पर चर्चा कर विवादित नामांतरण की समीक्षा और नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
पक्ष सुने बिना स्थगन आदेश का आरोप :-
शिकायतकर्ता का आरोप है कि संबंधित नजूल अधिकारी ने उनका पक्ष सुने बिना स्थगन आदेश पारित कर दिया। उनका कहना है कि कई पेशियां हो चुकी हैं, लेकिन अब तक प्रकरण का अंतिम निराकरण नहीं हुआ है। यही वजह है कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच और राजस्व रिकॉर्ड के सत्यापन की मांग उठाई है।
FIR के बाद अब न्यायालय में मामला :-
FIR दर्ज होने के बाद विवाद अब न्यायालय तक पहुंच चुका है। शिकायतकर्ता का कहना है कि पूरे मामले में पुराने राजस्व अभिलेख, खसरा नंबर, नामांतरण आदेश, संबंधित दस्तावेज और अधिकारियों की कार्रवाई की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि शिकायतकर्ता ने लंबे समय से पदस्थ राजस्व अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। यदि रिकॉर्ड की जांच में शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो नामांतरण की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
हालांकि, अभी यह स्पष्ट रूप से कहना उचित नहीं होगा कि जमीन के मामले में कोई घोटाला हुआ है। शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। संबंधित राजस्व अधिकारियों और अन्य पक्षों का आधिकारिक पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा। पूरे मामले में अंतिम स्थिति सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय के निर्णय और आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।