1857 की क्रांति की गवाह रायपुर की पुरानी जेल बदहाल, 15 अगस्त पर स्मारक घोषित करने की मांग

Uncategorized

रायपुर : 15 अगस्त 2026,आज रायपुर की पहचान केंद्रीय जेल से होती है, लेकिन 1857 की क्रांति के दौर में शहर की मौजूदा केंद्रीय जेल अस्तित्व में ही नहीं थी। उस समय शहर के बीचों-बीच बैजनाथ तालाब के किनारे मौजूद एक प्राचीन जेल अंग्रेजी हुकूमत की कैदगाह थी। आज यही ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के कारण खंडहर में तब्दील हो रहा है। इतिहासकारों के मुताबिक, 1857 के विद्रोह के दौरान क्रांतिकारियों को इसी जेल में कैद रखा गया था और इसके आसपास ही कई सेनानियों को फांसी दिए जाने का इतिहास दर्ज है।स्वतंत्रता दिवस के मौके पर इस भूली-बिसरी धरोहर को ऐतिहासिक स्मारक घोषित करने की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। वरिष्ठ इतिहासकार एवं महाकौशल इतिहास परिषद के सचिव डॉ. रमेंद्रनाथ मिश्र का कहना है कि 15 अगस्त 2026 को यदि इस प्राचीन जेल को ऐतिहासिक स्मारक घोषित किया जाता है, तो यह 1857 के शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

1857 में नहीं थी रायपुर की मौजूदा केंद्रीय जेल :-

डॉ. मिश्र के अनुसार, छत्तीसगढ़ में अंग्रेजी शासन स्थापित होने के बाद 1854 से 1861 के बीच यह क्षेत्र नागपुर प्रांत का हिस्सा था। 1861 में मध्य प्रांत बनने के बाद नई जेल व्यवस्था विकसित हुई और इसके बाद रायपुर की मौजूदा केंद्रीय जेल का निर्माण करीब 1862 के आसपास हुआ।

इसका मतलब है कि 1857 की क्रांति के समय वर्तमान केंद्रीय जेल मौजूद ही नहीं थी।उस दौर में रायपुर की पहली जेल शहर के उस हिस्से में थी, जिसे आज तहसील कार्यालय के पीछे के क्षेत्र से जोड़ा जाता है। इस प्राचीन जेल के बचे हुए अवशेष आज भी उस दौर के इतिहास की गवाही देते हैं।

क्रांतिकारियों की कैद और फांसी से जुड़ा इतिहास :-

1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने के लिए क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर जेल में रखा गया था। इतिहासकारों के अनुसार, इसी क्षेत्र में क्रांतिकारियों को फांसी दिए जाने की घटनाएं भी हुईं।डॉ. मिश्र के मुताबिक, 10 दिसंबर 1857 को वीर नारायण सिंह को फांसी दी गई थी।

इसके बाद जनवरी 1858 में रायपुर में विद्रोह की घटनाएं हुईं और 22 जनवरी को 17 लोगों की गिरफ्तारी तथा उन्हें फांसी दिए जाने का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार 1857 के संघर्ष में छत्तीसगढ़ के 18 लोगों ने बलिदान दिया था।वीर नारायण सिंह के इतिहास को सामने लाने की दिशा में 1975 में उनके बलिदान दिवस का आयोजन शुरू हुआ, जो आज भी जारी है। उनके जीवन और संघर्ष पर शोध तथा पीएचडी का काम हुआ और इससे जुड़े दस्तावेज भी सामने आए।

डॉ. मिश्र बताते हैं कि उन्होंने 1998 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘वीर नारायण सिंह’ में इस पुरानी जेल का पहला चित्र भी शामिल किया था।

आज का मोतीबाग-शास्त्री बाजार, कभी था बैजनाथ तालाब :-

इतिहासकारों के मुताबिक, आज जिस इलाके को मोतीबाग और शास्त्री बाजार के आसपास के क्षेत्र के रूप में जाना जाता है, वह कभी बैजनाथ तालाब का हिस्सा था। यह क्षेत्र तीन तरफ से पानी से घिरा हुआ था और इसी भौगोलिक स्थिति के बीच प्राचीन जेल स्थित थी।

जेल के आसपास सुरक्षा के लिए खाई बनाई गई थी। इसके पास एक बड़ा कुआं भी था, जहां से बड़ी संख्या में लोगों को पानी मिलने की बात कही जाती है। बाद में इस कुएं को पाट दिया गया। समय के साथ तालाब और पुराने परिसर का बड़ा हिस्सा भी खत्म हो गया, लेकिन जेल के अवशेष और खाई के निशान आज भी इस जगह की ऐतिहासिक पहचान को सामने लाते हैं।

1857 से अलग अध्याय है मौजूदा केंद्रीय जेल का इतिहास :-

इतिहासकारों के मुताबिक, 1857 की क्रांति के बाद प्रशासनिक और जेल व्यवस्था में बदलाव आया। 1861 में मध्य प्रांत का गठन हुआ और इसके बाद करीब 1862 में रायपुर की मौजूदा केंद्रीय जेल का निर्माण हुआ। बाद में 1903 में बरार के शामिल होने के बाद मध्य प्रांत एवं बरार की व्यवस्था बनी, जो 1956 तक चली।इस लिहाज से रायपुर की मौजूदा केंद्रीय जेल और 1857 के दौर की प्राचीन जेल इतिहास के दो अलग-अलग अध्याय हैं। यही अंतर पुराने जेल परिसर को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है।

पुरानी जेल के निर्माण का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं

दिलचस्प बात यह है कि 1857 से पहले इस जेल भवन का निर्माण ठीक किस वर्ष हुआ था, इसका कोई स्पष्ट अभिलेख उपलब्ध नहीं है। हालांकि, इतिहासकारों के अनुसार भवन की वास्तुकला ब्रिटिशकालीन निर्माण शैली से मेल खाती है। ऐसे में इसके ब्रिटिश युग में निर्मित होने की संभावना जताई जाती है। यही वजह है कि इस स्थल का पुरातात्विक और ऐतिहासिक अध्ययन कराकर इसे संरक्षित करने की मांग उठ रही है।

नया संग्रहालय बन रहा, पुरानी धरोहर उपेक्षित :

नवा रायपुर में करीब 10 एकड़ जमीन पर लगभग 52 करोड़ रुपये की लागत से वीर नारायण सिंह का संग्रहालय बनाया जा रहा है। डॉ. मिश्र इस संग्रहालय की सलाहकार समिति के अध्यक्ष हैं। उनके मुताबिक संग्रहालय के लिए वीर नारायण सिंह के परिवार और रिश्तेदारों से संपर्क कर ऐतिहासिक जानकारी जुटाई गई है।उनका कहना है कि जब वीर नारायण सिंह को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है और रायपुर का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम भी उनके नाम पर है, तब उनके संघर्ष और 1857 के छत्तीसगढ़ के इतिहास से जुड़ी वास्तविक धरोहरों को भी संरक्षित किया जाना चाहिए।

a

इमारतें टूटेंगी तो इतिहास भी मिट जाएगा’ : डॉ. मिश्र

रायपुर की पुरानी ऐतिहासिक इमारतों के लगातार खत्म होते जाने को लेकर भी चिंता जताते हैं। उनका कहना है कि बूढ़ा तालाब के पास मौजूद पुराने किले के पत्थरों से अंग्रेजों ने कई भवनों का निर्माण कराया था। इनमें तहसील कार्यालय, जिला एवं सत्र न्यायालय, कलेक्टर कार्यालय और एसपी कार्यालय जैसे भवनों का उल्लेख मिलता है। समय के साथ इनमें से कई पुराने भवन खत्म हो चुके हैं या बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।

जनप्रतिनिधियों से 24 मिनट निकालने की अपील :-

डॉ. मिश्र ने विधायक, सांसद, मंत्री और अन्य जनप्रतिनिधियों से इस धरोहर को बचाने के लिए आगे आने की अपील की है। उनका कहना है कि यदि छत्तीसगढ़ के लिए 24 घंटे में सिर्फ 24 मिनट भी निकालकर इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए, तो इस ऐतिहासिक स्थल को बचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है।उनके मुताबिक यह सिर्फ एक जर्जर इमारत को बचाने का मामला नहीं है, बल्कि उन क्रांतिकारियों की स्मृति को सुरक्षित रखने का सवाल है, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई और अपना जीवन बलिदान कर दिया।

15 अगस्त पर लोगों को फैसले की उम्मीद :-

स्वतंत्रता दिवस केवल 1947 में मिली आजादी का उत्सव नहीं, बल्कि उन बलिदानों को याद करने का अवसर भी है जिनकी नींव पर स्वतंत्र भारत खड़ा हुआ। 1857 के संघर्ष से जुड़ी रायपुर की यह पुरानी जेल आज संरक्षण की बाट जोह रही है।यदि 15 अगस्त 2026 को सरकार इस प्राचीन जेल परिसर को ऐतिहासिक स्मारक घोषित करने का फैसला करती है, तो यह रायपुर और छत्तीसगढ़ के इतिहास के लिए महत्वपूर्ण कदम होगा। इससे आने वाली पीढ़ियां 1857 की क्रांति को केवल किताबों में नहीं पढ़ेंगी, बल्कि उससे जुड़ी वास्तविक धरोहर को अपनी आंखों से देख सकेंगी।सवाल अब यही है कि 1857 की क्रांति की इस गवाह को कब तक खंडहर बनने के लिए छोड़ दिया जाएगा?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *