सोमनाथ से दुनिया को भारत का संदेश: आस्था, स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई गाथा

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नई दिल्ली/रायपुर। केंद्र सरकार ने सोमनाथ मंदिर को केवल आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय स्वाभिमान और पुनर्जागरण का जीवंत केंद्र बताया है। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत द्वारा लिखे गए विशेष लेख “सोमनाथ : आस्था, संकल्प और पुनर्जागरण की अनंत धारा” में भारत की सनातन परंपरा, सांस्कृतिक शक्ति और ऐतिहासिक धैर्य को विस्तार से रेखांकित किया गया है।लेख में कहा गया है कि गुजरात के काठियावाड़ तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर केवल एक ज्योतिर्लिंग नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की अमर चेतना का प्रतीक है। अनेक आक्रमणों और विध्वंस के बाद भी सोमनाथ का पुनर्निर्माण होते रहना भारत की आत्मशक्ति और अटूट आस्था का प्रमाण माना गया है।केंद्रीय मंत्री ने अपने लेख में उल्लेख किया कि प्राचीन भारत में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के प्रमुख केंद्र भी थे। सोमनाथ का इतिहास संघर्ष और पुनर्निर्माण की ऐसी गाथा है, जिसने सदियों बाद भी भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधे रखा। लेख में यह भी बताया गया कि स्वतंत्रता के बाद देश के प्रथम उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 1947 में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया था। इसके बाद 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई, जिसने देश की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा दी।लेख में “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 2026-27” का भी उल्लेख किया गया है। यह वर्षभर चलने वाला राष्ट्रीय आयोजन होगा, जिसके माध्यम से 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले दर्ज आक्रमण के 1000 वर्ष तथा 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर के पुनः उद्घाटन के 75 वर्ष पूरे होने को स्मरण किया जाएगा।केंद्र सरकार के अनुसार 11 मई 2026 तक देशभर में सांस्कृतिक आयोजन, यात्राएं, संवाद, शैक्षिक कार्यक्रम और विभिन्न ज्योतिर्लिंगों एवं शिवालयों में विशेष गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। इस आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारत की सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत मूल्यों से जोड़ना है।लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सोमनाथ में हुए विकास कार्यों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें धरोहर संरक्षण, आधारभूत संरचना विकास, सांस्कृतिक गतिविधियों के विस्तार और पर्यावरणीय संतुलन आधारित पहलों को नए भारत की सांस्कृतिक दृष्टि का हिस्सा बताया गया है।अपने लेख के अंत में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इक्कीसवीं सदी के भारत के लिए सोमनाथ यह संदेश देता है कि कोई भी सभ्यता तभी मजबूत रहती है, जब वह अपनी जड़ों से जुड़ी रहे और समय के साथ आगे बढ़ते हुए सभी को साथ लेकर चले।

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