जशपुर/महासमुंद।छत्तीसगढ़ में मेडिकल शिक्षा से जुड़े एक कथित सौदे का दस्तावेज सामने आने के बाद शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ₹100 के नोटरीकृत स्टाम्प पेपर पर दर्ज एक इकरारनामे में मेडिकल कॉलेज में प्रवेश दिलाने के नाम पर ₹20 लाख रुपये लिए जाने और बाद में रकम लौटाने की शर्तों का उल्लेख होने का दावा किया जा रहा है।
दस्तावेज के अनुसार, सरायपाली निवासी एक निजी अस्पताल संचालक ने पत्थलगांव निवासी एक व्यक्ति की पुत्री का रायपुर स्थित मेडिकल कॉलेज में प्रवेश कराने का आश्वासन देकर ₹20 लाख प्राप्त किए थे। निर्धारित कॉलेज में प्रवेश नहीं होने पर छात्रा को दूसरे मेडिकल संस्थान में दाखिला दिलाया गया, जहां नियमित फीस अलग से जमा कराई गई।रकम वापसी की समयसीमा भी खत्मइकरारनामे में उल्लेख है कि यदि तय संस्थान में प्रवेश नहीं हो पाता है तो 15 मई 2026 तक ₹20 लाख की राशि वापस की जाएगी। हालांकि यह समयसीमा बीत जाने के बाद भी कथित तौर पर राशि वापसी नहीं होने और किसी कानूनी कार्रवाई के सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आने से मामले को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। गवाहों की भूमिका भी चर्चा मेंदस्तावेज में दो गवाहों के हस्ताक्षर भी दर्ज बताए जा रहे हैं। इनमें एक नाम चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति का होने की चर्चा है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि दस्तावेज वास्तविक है तो इसमें शामिल सभी पक्षों की भूमिका की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।जांच एजेंसियों की चुप्पी पर सवालमामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि लाखों रुपये के कथित नकद लेन-देन और मेडिकल सीट दिलाने के दावे जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद अब तक संबंधित जांच एजेंसियों द्वारा कोई सार्वजनिक कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यदि दस्तावेज और उसमें दर्ज तथ्य सही पाए जाते हैं तो यह केवल धोखाधड़ी का मामला नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कथित दलाली और अवैध प्रवेश नेटवर्क की ओर भी संकेत कर सकता है।
जांच के बाद ही सामने आएगी सच्चाईहालांकि इस पूरे मामले में संबंधित पक्षों का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने आना बाकी है। दस्तावेज की प्रामाणिकता, धन के लेन-देन और प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों की पुष्टि सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा ही की जा सकती है। लेकिन सामने आए दस्तावेज ने मेडिकल शिक्षा में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।
यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल एक छात्रा के प्रवेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रदेश में शिक्षा माफिया के संभावित नेटवर्क की जांच का आधार बन सकता है।