जनजातीय अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए डीलिस्टिंग आवश्यक – केदार कश्यप

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जगदलपुर। छत्तीसगढ़ शासन के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने दिल्ली में आयोजित जनजाति समाज के विशाल समागम में डीलिस्टिंग के मुद्दे पर व्यक्त जनभावनाओं का समर्थन करते हुए कहा है कि अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों और मूल आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए डीलिस्टिंग आज समय की आवश्यकता बन चुकी है। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के संबोधन में रखे गए विचारों से सहमति जताते हुए कहा कि जनजातीय समाज के अधिकारों पर किसी प्रकार का अतिक्रमण स्वीकार नहीं किया जा सकता।वन मंत्री कश्यप ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित जनजातियों को विशेष संरक्षण इसलिए दिया था ताकि सदियों से वंचित और वनांचल में रहने वाले समुदायों का सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक उत्थान हो सके। लेकिन वर्तमान समय में अनेक स्थानों पर ऐसे लोग भी इन आरक्षण और सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं, जिन्होंने अपनी मूल जनजातीय परंपरा, रीति-रिवाज और सामाजिक पहचान से स्वयं को अलग कर लिया है। इससे वास्तविक वनवासी और आदिवासी समाज अपने अधिकारों से वंचित हो रहा है।उन्होंने कहा कि डीलिस्टिंग का उद्देश्य किसी के खिलाफ भेदभाव करना नहीं, बल्कि वास्तविक जनजातीय समाज के अधिकारों की रक्षा करना है। यदि कोई व्यक्ति या समूह अपनी पारंपरिक जनजातीय आस्था, सामाजिक व्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान से पूर्णतः अलग होकर अन्य व्यवस्थित एवं प्रभावशाली धार्मिक-सामाजिक ढांचे में समाहित हो जाता है, तब उसे अनुसूचित जनजाति वर्ग के विशेष संरक्षण का लाभ मिलते रहना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। कश्यप ने कहा कि डीलिस्टिंग लागू होने से जनजातीय आरक्षण, छात्रवृत्ति, सरकारी योजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का लाभ उन्हीं लोगों तक पहुंचेगा, जिनके लिए संविधान में इसकी व्यवस्था की गई थी। इससे आदिवासी युवाओं के शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तथा वनांचल क्षेत्रों में सामाजिक संतुलन भी मजबूत होगा।वन मंत्री ने कहा कि देशभर के जनजातीय समाज में इस विषय को लेकर व्यापक जागरूकता बढ़ रही है और दिल्ली के समागम में उमड़ी जनभागीदारी इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी समाज अब अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित रूप से आवाज उठा रहा है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार जनजातीय हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आदिवासी समाज के सम्मान, संस्कृति और अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।

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