कवर्धा में वर्मी कंपोस्ट से आत्मनिर्भरता की नई राह: वन विकास निगम बना सफलता का मॉडल

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रायपुर, 22 अप्रैल 2026।छत्तीसगढ़ में वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) उत्पादन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ आत्मनिर्भरता का सशक्त माध्यम बनकर उभर रहा है। खासकर महिलाओं और किसानों के लिए यह कम लागत में बेहतर आय का जरिया साबित हो रहा है। जैविक खेती को बढ़ावा देने वाली यह पहल रासायनिक खादों पर निर्भरता घटाकर मिट्टी की उर्वरता को भी सुधार रही है।वन मंत्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम के कवर्धा परियोजना मंडल ने इस दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। गुडली रोपणी में शुरू किए गए वर्मी कंपोस्ट उत्पादन ने न केवल विभाग की जरूरतें पूरी की हैं, बल्कि अब यह आय का स्थायी स्रोत भी बनता जा रहा है।कम संसाधनों में बड़ा परिणामबिना अतिरिक्त बजट के उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करते हुए यहां 6 वर्मी टैंकों के माध्यम से महज 3 माह में 150 क्विंटल खाद तैयार की गई। इस आधार पर वार्षिक उत्पादन का लक्ष्य करीब 600 क्विंटल रखा गया है, जो सीमित संसाधनों में उत्कृष्ट प्रबंधन का उदाहरण है।

खरीदार से बने विक्रेतापहले जहां मंडल को नर्सरी के लिए बाहर से खाद खरीदनी पड़ती थी, वहीं अब अपनी जरूरतों के बाद भी 500 क्विंटल से अधिक वर्मी कंपोस्ट अतिरिक्त रूप से उपलब्ध है। इसे अन्य परियोजना मंडलों को बेचकर आय अर्जित की जाएगी, जिससे लागत में कमी और राजस्व में वृद्धि होगी।स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरइस परियोजना से स्थानीय ग्रामीणों को सीधे तौर पर रोजगार मिला है। खाद निर्माण कार्य में उनकी भागीदारी से उन्हें गांव में ही काम और आय के नए अवसर मिल रहे हैं।ब्रांडिंग की तैयारीवन विकास निगम अब इस उत्पाद को एक ब्रांड के रूप में बाजार में उतारने की तैयारी कर रहा है। पैकेजिंग और ब्रांडिंग के माध्यम से न केवल उत्पाद की पहचान बढ़ेगी, बल्कि भविष्य में रोजगार के और अवसर भी सृजित होंगे।कवर्धा परियोजना मंडल की यह पहल अन्य क्षेत्रों के लिए प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभर रही है। यह दर्शाता है कि नवाचार और बेहतर प्रबंधन के जरिए सरकारी विभाग भी आत्मनिर्भर और लाभकारी बन सकते हैं, साथ ही ग्रामीण विकास और जैविक खेती को नई दिशा दे सकते हैं।

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