Lucknow: यूपी वित्त लेखा सेवा के पुरोधा आर के पांडे का उचित इलाज नहीं मिल पाने के कारण निधन हो गया ! लखनऊ में वित्तीय प्रबंध परीक्षण संस्थान के सहायक निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए आर के पांडे “फंगल मेनिनजाइटिस” नामक दुर्लभ बीमारी से ग्रसित थे. लेकिन गंभीर रूप से बीमार स्व पांडे को उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के प्रयासों के बावजूद इलाज के लिए SGPGI में भर्ती नहीं कराया जा सका था.
फंगल मेनिनजाइटिस नामक बीमारी से रहे ग्रसित, वित्तीय नियमों का एनसाइक्लोपीडिया माने जाने वाले राजेंद्र कुमार पांडे को देश प्रदेश की कई संस्थाएं और विभाग प्रशिक्षण देने के लिए आमंत्रित करते रहे हैं. गत माह गाजियाबाद के एक संस्थान में प्रशिक्षण हेतु व्याख्यान देने गए पांडे जी को वापस लखनऊ आने के बाद स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें शुरू हुई. डॉक्टरों ने प्रथम दृष्टया यूरिन इंफेक्शन का मामला बताया. इलाज शुरू हुआ लेकिन आराम नहीं मिला. बलरामपुर अस्पताल और केजीएमयू के चक्कर काटने और तमाम मेडिकल टेस्ट कराए जाने के बावजूद स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार आता ना देख परिजनों ने एसजी पीजीआई में भर्ती करने की सोची. लेकिन कोई सीधा -सज्जन व्यक्ति इतनी आसानी से एसजीपीजीआई में दाखिला ले ले यह कैसे मुमकिन है?
जानकारी के मुताबिक सूबे के उपमुख्यमंत्री और चिकित्सा शिक्षा विभाग के कैबिनेट मंत्री बृजेश पाठक द्वारा दूरभाष पर कई बार निर्देश दिए जाने के बावजूद भी संजय गांधी स्नातकोत्तर और विज्ञान संस्थान, लखनऊ में एक अदद बेड की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं कराई जा सकी.
ऐसे में सवाल केवल उपमुख्यमंत्री की सिफारिश को नजरअंदाज करने की ही नहीं है बल्कि SGPGI जैसे शोध और प्रशिक्षण के प्रतिष्ठित संस्थान ऐसी दुर्लभ बीमारी को लेकर संजीदा नहीं रहे.
दिवंगत राजेंद्र कुमार पांडे के मेडिकल सर्टिफिकेट के अनुसार वह फंगल मेनिनजाइटिस जैसी घातक और दुर्लभ बीमारी से ग्रसित हो चुके थे. एसजीपीजीआई जैसे संस्थानों द्वारा अगर ऐसी दुर्लभ बीमारियों के लिए अनुसंधान और चिकित्सा का कार्य आगे बढ़कर नहीं किया जाता है तो सवाल उठता है कि फिर ऐसे नामचीन संस्थानों के स्थापना का उद्देश्य क्या है? भारत में विरले ही पाई जाने वाली इस बीमारी का उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में प्रवेश और चिकित्सा संस्थानों की उदासीनता गंभीर चिंता का विषय है.
लखनऊ के गुलाला घाट श्मशान घाट पर सोमवार को आर के पांडेय अंतिम संस्कार सम्पन्न हुआ. इस मौके पर अंतिम विदाई देने के लिए एकत्रित हुए सूबे की वित्त लेखा सेवा के हर कार्मिक और अधिकारी की आंखें नम थी. इस दौरान लोगों में यह चर्चा और सवाल जरूर था कि अगर इलाज मिला होता तो शायद उनकी जान बचायी जा सकती थी. लोग जहाँ एक तरफ उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक के प्रयासों की सराहना कर रहे थे तो दूसरी तरफ यह सवाल भी खड़ा कर रहे थे कि क्या मेडिकल सिस्टम के आगे खुद उपमुख्यमंत्री नतमस्तक हैं।