नई दिल्ली : भारत खाद्यान्न की कमी के दौर से निकलकर रिकॉर्ड पैदावार के मुकाम तक पहुँच चुका है। अब अगला बड़ा कदम उत्पादन की मात्रा से मूल्य संवर्धन की ओर, और खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर बढ़ना है। यह बदलाव जलवायु-अनुकूल विज्ञान, कटाई-उपरांत मूल्य श्रृंखलाओं और आधुनिक नवाचार तथा पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से प्रेरित होगा, जहाँ किसानों की शुद्ध आय ही वास्तविक सफलता का पैमाना बनेगी।
भोजन केवल जीवन का आधार नहीं है; यह किसी भी राष्ट्र की सामाजिक स्थिरता, आर्थिक मजबूती और मानवीय गरिमा से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए, विश्व खाद्य दिवस केवल पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराने की हमारी प्रतिबद्धता को दोहराने का अवसर नहीं है, बल्कि यह इस बात पर विचार करने का भी समय है कि हमारी खाद्य प्रणालियाँ वास्तव में कितनी सुरक्षित, पौष्टिक, टिकाऊ और किसान-केंद्रित हैं। वर्ष 2026 की थीम- “इनोवेट टुडे,नरिश टुमारो”, इसी बदलती प्राथमिकता की ओर संकेत करती है। अत्याधुनिक नवाचार को पारंपरिक ज्ञान और समावेशी दृष्टिकोण के साथ जोड़ने का इस वर्ष का खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का आह्वान भारत की अपनी कृषि विकास यात्रा से गहराई से मेल खाता है।
भारत की कृषि यात्रा बदलाव की एक उल्लेखनीय गाथा है। स्वतंत्रता के बाद देश खाद्यान्न संकट, निम्न उत्पादकता और आयात पर अत्यधिक निर्भरता से जूझ रहा था। उन्नत बीजों, सिंचाई, कृषि अनुसंधान, उर्वरक, संस्थागत ऋण और मूल्य समर्थन के समन्वित प्रयासों ने हरित क्रांति को जन्म दिया। इसका परिणाम केवल गेहूं और धान के उत्पादन में वृद्धि तक सीमित नहीं रहा; भारत ने खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता हासिल की और अपने विकास की मजबूत नींव रखी। कभी खाद्य सहायता पर निर्भर रहने वाला भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा दूध और दलहन उत्पादक तथा चावल का सबसे बड़ा निर्यातक बन चुका है।
आज कृषि को केवल अनाज उत्पादन के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं रह गया है। कृषि अब पोषण, रोजगार, उद्यमिता, मूल्य संवर्धन और ग्रामीण समृद्धि का उत्प्रेरक बन रही है।
कृषि विकास का बदलता स्वरूप
भारत के कृषि परिवर्तन को मोटे तौर पर तीन चरणों में देखा जा सकता है। 1967 से 1995 के बीच मुख्य ध्यान खाद्यान्न आत्मनिर्भरता और अनाज उत्पादन पर केंद्रित था। 1996 से 2014 के दौरान बदलती खाद्य माँग और बढ़ती आय के साथ कृषि विविधीकरण ने गति पकड़ी। वर्ष 2015 के बाद, विविधीकरण के साथ-साथ संसाधन दक्षता, जलवायु अनुकूलनशीलता (क्लाइमेट रेजिलिएंस) और किसानों की आय प्रमुख प्राथमिकताओं के रूप में उभरे हैं।
इस बदलाव का स्पष्ट प्रमाण कृषि विकास के आंकड़ों में दिखाई देता है, जो कृषि की गति में एक संरचनात्मक उछाल को दर्शाते हैं। 1967-1995 की अवधि में औसत वार्षिक वृद्धि दर 2.71% रही और 1996-2014 के बीच 2.98% रही, जिसके बाद 2015 के बाद के दौर में यह उल्लेखनीय रूप से तेज होकर लगभग 4.51% तक पहुँच गई। वर्तमान में भी भारत की कृषि यात्रा नई ऊँचाइयों को छू रही है। वर्ष 2024-25 में प्राप्त 357.73 मिलियन टन के रिकॉर्ड उत्पादन के बाद, 2025-26 में राष्ट्रीय खाद्यान्न उत्पादन के 376.56 मिलियन टन के अभूतपूर्व स्तर पर पहुँचने का अनुमान है। यह चावल, गेहूं और मक्के की रिकॉर्ड पैदावार से प्रेरित 5.3% की मजबूत सालाना वृद्धि है।
हालाँकि ये उपलब्धियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आज का सवाल केवल यह नहीं है कि हम कितना अधिक उत्पादन कर सकते हैं। वास्तविक सवाल यह है कि हम कम से कम संसाधनों में कितना बेहतर उत्पादन कर सकते हैं, और उस उत्पादन के माध्यम से किसानों की आय में कितनी वृद्धि कर सकते हैं।
कृषि में जलवायु संबंधी बदलाव का नेतृत्व विज्ञान को क्यों करना चाहिए
तेजी से बढ़ता जलवायु परिवर्तन, भूजल का गंभीर दोहन, मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट और ग्रहीय संसाधनों की सीमित सीमाएँ कृषि विकास के तौर-तरीकों में एक बुनियादी बदलाव की माँग करती हैं। अगली कृषि क्रांति अंधाधुंध संसाधन खपत पर निर्भर नहीं हो सकती; इसका मूल उद्देश्य कम लागत, न्यूनतम जलवायु जोखिम, संसाधनों का बेहतर उपयोग और किसानों की बेहतर आजीविका होना चाहिए।
यहाँ राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणालियाँ निर्णायक भूमिका निभाती हैं। अब प्राथमिकता सूखा, अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और उभरते जैव-सुरक्षा खतरों जैसे बहुआयामी जलवायु संकटों का सामना करने में सक्षम लचीली फसल किस्मों को विकसित करने की होनी चाहिए, जिससे जल उत्पादकता का अधिकतम उपयोग हो सके और फसलों में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाई जा सके।
जीनोमिक्स, जीन एडिटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रिमोट सेंसिंग और प्रिसिजन डिजिटल एग्रीकल्चर जैसी अत्याधुनिक तकनीकें इस संरचनात्मक बदलाव को गति दे रही हैं। केवल वर्ष 2025-26 में ही भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा जारी की गई 386 नई फसल किस्मों में से 94% किस्में जलवायु-अनुकूल थीं और 29% बायोफोर्टिफाइड (जैव-संवर्धित) थीं। इसी के साथ, ICAR ने 805 बौद्धिक संपदा (आईपी) आवेदनों के साथ अपने पोर्टफोलियो का विस्तार किया और 36 राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण प्रणालियों को मजबूत किया।
यह दिशा एक गहरे पुनर्गठन का संकेत देती है। कृषि अनुसंधान अब केवल उत्पादन की मात्रा से तय नहीं होता, बल्कि जलवायु अनुकूलन और पोषण सुरक्षा को एक साथ सुनिश्चित करने की इसकी क्षमता से पहचाना जाता है। नया समीकरण सीधा है: प्रति बूंद अधिक फसल (मोर क्रॉप पर ड्रॉप), प्रति हेक्टेयर अधिक पोषण और प्रति किसान अधिक आय।
खेत से बाजार तक ही नहीं, खेत से मूल्य संवर्धन तक
किसानों की समृद्धि केवल उत्पादन से हासिल नहीं की जा सकती। किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य तभी मिलेगा जब वे पूरी मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) में सक्रिय भागीदार बनेंगे। इसलिए हमें अपनी सोच को “खेत से बाजार” (फार्म टू मार्केट) से बदलकर “खेत से मूल्य” (फार्म टू वैल्यू) की ओर ले जाना होगा।
कृषि उपज के मूल्य का एक बड़ा हिस्सा खेत के बाहर तैयार होता है। इसमें ग्रेडिंग, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, भंडारण, कोल्ड चेन, परिवहन और निर्यात शामिल हैं-ये सभी ऐसे महत्वपूर्ण पहलू हैं जो कृषि उपज का मूल्य बढ़ाते हैं। किसान उत्पादक संगठन (FPOs), सहकारी समितियाँ, कृषि अवसंरचना और डिजिटल बाजार इस बदलाव को तेज कर सकते हैं। भारत में लगभग 86% जोत छोटी और सीमांत होने के कारण, FPO के माध्यम से सामूहिक प्रयास ही इन किसानों के लिए अपनी उपज का सही मूल्य पाने का सबसे व्यावहारिक रास्ता है, जबकि ‘एग्री स्टैक’ और ‘ई-नाम’ (e-NAM) जैसे डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर उन्हें सीधे खरीदारों, ऋण और बाजार की वास्तविक जानकारी से जोड़ सकते हैं।
कृषि का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि खेत में क्या उगाया गया, बल्कि इस बात से तय होगा कि उस फसल से कितना अतिरिक्त मूल्य पैदा किया गया।
भारत की कृषि व्यवस्था का पुनर्गठन: खाद्य सुरक्षा से पोषण सुरक्षा की ओर
हरित क्रांति के जरिए खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के बाद, भारत का अगला रणनीतिक लक्ष्य बुनियादी खाद्य सुरक्षा से व्यापक पोषण सुरक्षा की ओर बढ़ना है। उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताएँ दालों, तिलहनों, फलों, सब्जियों, दूध, अंडों और मछली की माँग को बढ़ा रही हैं। इसके लिए कृषि नीति और ICAR के अनुसंधानों को इन बदलती आवश्यकताओं के अनुरूप ढलना होगा। इस बदलाव के लिए मुख्य आपूर्ति और संरचनात्मक चुनौतियों का समाधान करना जरूरी है। यद्यपि कम अवधि वाली किस्मों के माध्यम से घरेलू दलहन उत्पादन 2.6-2.7 करोड़ टन तक पहुँच गया है, फिर भी भारत अपने खाद्य तेल का 55-60% आयात करता है-इस अंतर को पाटना ही ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन’ का मुख्य लक्ष्य है।
‘आईसीएआर-केंद्रीय कटाई-उपरांत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान’ (CIPHET) के अनुमान बताते हैं कि फलों और सब्जियों में कटाई के बाद 4.5 से 15% और दालों और अनाजों में 3 से 6% का नुकसान होता है। आवश्यक पोषक तत्वों को सुरक्षित रखने के लिए खेत के पास ही सूक्ष्म गोदामों (माइक्रो-वेयरहाउसिंग) और कोल्ड चेन के माध्यम से कटाई-उपरांत होने वाले नुकसान को रोकना अनिवार्य है। इसके अलावा, चूँकि कृषि में 80% से अधिक ताजे पानी की खपत होती है, इसलिए ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना – प्रति बूंद अधिक फसल’ (PMKSY-PDMC) के तहत सूक्ष्म सिंचाई का विस्तार करना (जिससे जल दक्षता में 30-50% और उपज में 20-30% की वृद्धि होती है) तथा जल संकट वाले क्षेत्रों में दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों (मिलेट्स) को बढ़ावा देना प्रति इकाई जल से पोषण उत्पादन को अधिकतम करेगा।
छिपी भूख (कुपोषण) से निपटने के लिए ICAR ने 200 से अधिक बायोफोर्टिफाइड फसलों की किस्में जारी की हैं, जैसे जिंक युक्त गेहूं और आयरन युक्त बाजरा। इसके साथ ही भारत के अग्रणी पशुधन और मत्स्यपालन क्षेत्रों का भी विस्तार किया गया है-जहाँ वार्षिक दूध उत्पादन 230 मीट्रिक टन से अधिक है-ताकि देश के लिए एक संतुलित और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य टोकरी तैयार की जा सके।
विज्ञान और भारतीय ज्ञान प्रणालियों का समन्वय
भारत के कृषि परिवर्तन को व्यावहारिक रूप देने के लिए, नीतिगत ढाँचों को आधुनिक वैज्ञानिक नवाचार और भारतीय ज्ञान प्रणालियों (IKS) का एक प्रमाण-आधारित समन्वय स्थापित करना होगा। इसके तहत पारंपरिक कृषि और जल प्रबंधन पद्धतियों का व्यवस्थित मूल्यांकन और दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए, साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, IoT सेंसर और रिमोट सेंसिंग जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग होना चाहिए। इससे जलवायु-अनुकूल और जैव-विविधता से भरपूर कृषि ईकोसिस्टम तैयार करने में मदद मिलेगी। नवाचार और परंपरा का यही वह अनूठा मेल है जिसका आह्वान इस वर्ष के विश्व खाद्य दिवस का विषय करता है।
खाद्य आत्मनिर्भरता पर केंद्रित हरित क्रांति से आगे बढ़ते हुए, अब राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को व्यापक पोषण और पर्यावरणीय सुरक्षा की ओर केंद्रित होना चाहिए। इससे हर नागरिक को सुरक्षित और पोषक तत्वों से भरपूर भोजन मिलना सुनिश्चित होगा, साथ ही मिट्टी की दीर्घकालिक सेहत और जल उत्पादकता की भी रक्षा होगी।
इस दृष्टिकोण को साकार करने के लिए एक एकीकृत और समग्र सामाजिक रणनीति की आवश्यकता है, जो वैज्ञानिक अनुसंधान, किसानों की भागीदारी, बाजार अवसंरचना, नीतिगत हस्तक्षेपों और नागरिक जिम्मेदारी को एक साथ जोड़े। इसका उद्देश्य मात्रा-आधारित उत्पादन से मूल्य-संचालित समृद्धि की ओर बढ़ना है, जिससे किसानों की शुद्ध आय में वृद्धि, संसाधनों का संरक्षण और निरंतर बेहतर आहार गुणवत्ता ही कृषि की सफलता के मुख्य मानक बन सकें।
हालाँकि, नवाचार का वास्तविक महत्व तभी है जब वह अंतिम छोर तक पहुँचे। प्रत्येक तकनीक को ‘प्रयोगशाला से खेत’ (लैब टू लैंड) तक पहुँचना चाहिए, जिसमें महिला किसान, ग्रामीण युवा और कृषि-स्टार्टअप इस बदलाव के सक्रिय भागीदार बनें। आज का नवाचार कल के पोषण की नींव रखेगा। आज का संसाधन संरक्षण भविष्य की पीढ़ियों की खाद्य आपूर्ति सुरक्षित करेगा। और हमारे किसानों की बढ़ती समृद्धि ही इस पूरी यात्रा में सफलता का सबसे बड़ा पैमाना होगी। यही विश्व खाद्य दिवस का सच्चा सार है-खाद्य से पोषण तक, उत्पादन से मूल्य तक, और कृषि विकास से किसान की स्थायी समृद्धि तक।
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