विकास का कौन सा मॉडल रमन सिंह जी ने खड़ा किया ….राजबब्बर

Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ : छत्तीसगढ़ की लाखों जनता इलाज के नाम पर दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं या फिर प्राइवेट अस्पतालों के चंगुल में फंसकर लुट रहे हैं। डॉक्टर रमन सिंह  के मुख्यमंत्री के होते जो बदनामी कमाई है वह शर्मिंदा करती है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉक्टर भी है।

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आज स्वास्थ्य के मामले में देश के 21 राज्यों में से छत्तीसगढ़ का स्थान 20वां है।

यह विकास का कौन सा मॉडल रमन सिंह जी ने खड़ा किया है, यह समझ से परे है।

ये तथ्य दर्शाते है छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का सत्य।  22 फ़रवरी, 2018 को शासकीय चिकित्सालयों मे विशेषज्ञ डॉक्टरो के 893 स्वीकृत पदों के विरुद्ध मात्र 53 विशेषज्ञ चिकित्सक पदस्थ। 840 पद रिक्त तथा चिकित्सको के 1379 पदो के विरुद्ध 517 पद रिक्त बताये गये है। प्रशासकीय प्रतिवेदन के अनुसार नर्सिंग स्टाफ के कुल स्वीकृत 4362 पदो के विरुद्ध 1762 पद जबकि विधानसभा प्रश्न के उत्तर मे दी गयी जानकारी अनुसार 4338 पदो के विरुद्ध रिक्तियो की संख्या 1413 बतायी गयी है। छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने प्रदेश के स्वास्थ्य भी नहीं बक्शा और प्रदेश को बीमार बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ी हैं।

स्वास्थ्य विभाग के वार्षिक प्रशासकीय प्रतिवेदन मे (विधानसभा के समक्ष ही प्रस्तुत) चिकित्सा विशेषज्ञो के कुल स्वीकृत पदो 1525 के विरुद्ध 175 विशेषज्ञो कार्यरत होना तथा 1350 पद रिक्त होना बताया गया है। जबकि चिकित्सा अधिकारियों के कुल स्वीकृत 2048 पदो के विरुद्ध 1359 चिकित्सक कार्यरत होना तथा 689 पद रिक्त होना बताया गया है।

क्लीनिकल इन्स्ट्रक्टर, हेल्थ एजुकेटर, स्टोरकीपर (फार्मेसी) ओ.पी.डी. अटेन्डेन्ट, लैबअटेन्डेन्ट, सहायक मलेरिया अधिकारी, डेन्टल टेक्नीशियन, ओ.टी.टेक्नीशियन, ई.सी.जी. टेक्नीशियन, आडियोमीट्रिशियन, स्वास्थ्य शिक्षा विस्तार अधिकारी, डरमेटोलीजी टेक्नीशियन, डेन्टल असिस्टेंट के शत-प्रतिशत पद तथा लैब असिस्टेंट के 608 पद रिक्त है।

1 मार्च 2017 को विधानसभा प्रश्न मे दिये गये उत्तर के अनुसार राज्य मे विशेषज्ञ चिकित्सक के 1277 स्कीकृत पदो के विरुद्ध 1114 पद रिक्त होना, चिकित्सक के 1873 स्वीकृत पदों के विरुद्ध 410 रिक्त पद होना तथा नर्सिंग स्टाफ के 10769 पदों के विरुद्ध 1512 पद रिक्त होना बताया गया है।

15 फ़रवरी 2018 को विधानसभा मे एक अन्य प्रश्न के उत्तर मे राज्य मे सरकारी डॉक्टरो के कुल स्वीकृत पद 5378 तथा उसके विरुद्ध 2595 पद भरे हुए बताये गये है। जबकि संलग्न जानकारी के अनुसार स्वीकृत पद 3685 तथा भरे पद 1523 होने की जानकारी दी गयी है। उसी प्रश्न के उत्तर मे विशेषज्ञ कार्यरत चिकिस्तको की संख्या 838 बतायी गयी है। सम्पूर्ण जानकारी विरोधाभासी है।

राज्य मे स्थित 6 चिकित्सा महाविद्यालयो में चिकित्सको के कुल स्वीकृत 1693 पदों के विरुद्ध कार्यरत चिकित्सको की संख्या 1072 है तथा शेष 621 पद रिक्त है।

राज्य में सिकल सेल नामक बिमारी का अत्यधिक प्रकोप है, इसस निपटने हेतु सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ सिकल सेल इन्स्टीट्यूट का गठन किया गया है जिसमे कुल स्वीकृत 180 पदोंकेविरुद्ध 25 व्यक्तिहीकार्यरतहै।

स्वास्थ्य विभाग के प्रशासकीय प्रतिवेदन अनुसार संचालनालय, जिसके माध्यम से सभी मेडिकल कालेजो का संचालन किया जाता है, मे कुल स्वीकृत पद 8984 के विरुद्ध रिक्त पदो की संख्या 5332 बताय़ी गयी है।

नया रायपुर मे निर्मित हुए वेदान्ता केंसर अस्पताल मे गरीबो का निशुल्क इलाज करने हेतु सरकार से अनुबन्ध हुआ था, जिसे सरकार ने रद्द कर अस्पताल प्रबंधन को मनमाना शुल्क वसूल करने शिशु मृत्यु की छुट दे दी गयी है। रमन सिंह जी के कामकाज का ढंग देखिए कि वेदांता को गरीबों के इलाज के लिए अस्पताल की जगह दी गई, लेकिन अस्पताल तैयार होते होते उसे प्राइवेट कर दिया गया और गरीबों के इलाज की सुविधा ख़त्म कर दी गई।

सरकारी अस्पताल/मेडिकल कालेजो मे अरबो खर्च कर यह दावे किये गये कि सरकारी अस्पतालो मे इलाज की सभी सुविधाएं उपलब्ध है। किन्तु निजी चिकित्सालयो को मान्यता दिये जाने के नाम पर प्रतिवर्ष उन्हें करोड़ो का भुगतान किया जा रहा है।

अम्बिकापुर मेडिकल कालेज की मान्यता एम.सी.आई. द्वारा स्थगित कर दी गयी है।

राज्य मे स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से नसबंदी कांड, आंखफोड़वा कांड तथा किडनी रोग कांड हो चुके है, जिन मे सैकड़ो लोगो का अपनी जाने गवानी पड़ी है।

स्वास्थ्य विभाग द्वारा कमीशन खोरी के चक्कर मे करोड़ो अरबो की मशीनो की खरीदी की गयी है। किन्तु चिकित्सकों एवं तकनीकी कर्मचारियों के अभाव मे अधिकांश मशीन धूल खाती पड़ी है। सभी शासकीय अस्पतालो मे अव्यवस्था चरम पर है तथा गरीब मरीज दर-दर की ठोकर खाने को विवश है।

दवाओं के क्रय हेतु सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन का गठन किया गया है किन्तु यह भ्रष्टाचार एवं कमीशनखोरी का अड्डा बन चुका है। हाल ही मे ए.सी.बी. द्वारा की गयी छापेमारी की कार्यवाही से यह भंडाफोड़ हुआ है कि राज्य के उच्च पदस्थ लोग भी करोड़ो की कमीशनखोरी के खेल मे शामिल है। शासकीय अस्पतालो मे लापरवाही के कारण प्रतिवर्ष सैकड़ो बच्चो की मौत हुई।

नसबंदी करवाने गईं माताएं अपनी जान गंवाती हैं तो आंखों का इलाज करवाने गए बुज़ुर्ग अपनी आंखों की रोशनी गवां देते हैं.

हद है कि आंखों की रोशनी बालोद में छिनती है, फिर राजनांदगांव में, फिर एम्स में और फिर राजनांदगांव में. यानी डॉक्टर रमन सिंह अपने विधानसभा में भी बुजुर्गों की आंखों की रोशनी नहीं बचा पा रहे हैं.

सुपेबेड़ा में 170 से ज़्यादा लोग किडनी फेल होने की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं. वजह यह है कि उन्हें पीने का साफ़ पानी नहीं मिल रहा है. स्वास्थ्य मंत्री वक्तव्य देते हैं कि किडनी फेल होने से लोग नहीं मर रहे हैं बल्कि खून में यूरिया और क्रिएटेनीन बढ़ने से मर रहे हैं. स्वास्थ्य मंत्री अपने डॉक्टर मुख्यमंत्री से ही पूछ लेते कि ये दोनों तत्व खून में क्यों बढ़ते हैं.

मुझे जैसा साधारण व्यक्ति भी जानता है कि किडनी की बीमारी होने से ही ऐसा होता है।

जिस समस्या को सरकार को राजकीय आपदा घोषित करके युद्धस्तर पर काम करना चाहिए, वहां सरकार लीपापोती करती है। मुख्यमंत्री के वहां जाने का समय तक नहीं निकाल पाते, सारा समय सिर्फ़ अपने परिवार की जेब भरने में व्यतीत करते हैं, प्रदेश के स्वास्थ्य को दरकिनर कर।

15 वर्षों में बस्तर में एक ऐसा अस्पताल नहीं बन पाया जहां नक्सली हमले में घायल जवानों का उपचार हो सके। हर बार घायल जवान हेलिकॉप्टर से रायपुर लाए जाते हैं और विडंबना देखिए कि यहां भी इलाज सरकारी अस्पताल में नहीं हो पाता।

सीएसआर मद से जिन अस्पतालों का निर्माण बिलासपुर और रायगढ़ में होना चाहिए वह भी रायपुर आ रहे हैं। तो क्या रमन सिंह जी सिर्फ़ रायपुर के मुख्यमंत्री हैं?

लोकसभा में 11.08.2017 को केंद्रीय मंत्री की ओर से दिए गए एक जवाब में दिए गए आंकड़ों के अनुसार,  6 महीने से 5 वर्ष के उम्र के बच्चों में कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या 47.1 प्रतिशत है। ग्रामीण इलाक़ों में यह  50.1 प्रतिशत तक है।

शहरी इलाक़ों में 71.2 प्रतिशत  बच्चे रक्तल्पता (nemia) के शिकार हैं जबकि ग्रामीण इलाक़ों में यह प्रतिशत 82.1 प्रतिशत तक है।

महिलाओं में अभी भी 43.4 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 45.7 प्रतिशत तक है।छत्तीसगढ़ की 57.5 प्रतिशत महिलाएं रक्तल्पता (anemia) की शिकार हैं जबकि ग्रामीण इलाक़ों में यह 59.8 प्रतिशत है।

डॉक्टर रमन सिंह के सरकार में ने पिछले 15 सालों में जगदलपुर, रायगढ़, राजनांदगांव और अंबिकापुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले, जिसमें से अंबिकापुर और राजनांदगांव अभी भी तदर्थ वाद पर चल रहे हैं शुरू के सालों में जगदलपुर और रायगढ़ में जीरो ईयर घोषित हो गया क्योंकि सस्ती लोकप्रियता के चलते डॉक्टर रमन सिंह ने वहां डॉक्टर्स के रूप में शिक्षक पोस्ट ही नहीं किए।

जिसके कारण ओने पौने में व्यवस्था चलती रही।

डेंटल कॉलेज 15 साल पुराना हो गया लेकिन वहां पर अभी भी पोस्ट ग्रेजुएट की सीटें नहीं खुल पाई।

4 वर्ष पूर्व तो ऐसा हुआ कि केवल 100 के स्थान पर पांच ही छात्र वहां भर्ती हो पाए 2002-03 में जो बिलासपुर का मेडिकल कॉलेज खुला वहां पर अभी भी पोस्ट ग्रेजुएट की सीटें 15 वर्ष बाद भी शुरू में हो पाई।

डेंटल कॉलेज में अभी तक स्नातकोत्तर की पढ़ाई शुरू नहीं हो पाई है रमन सिंह सरकार गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा शिक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाई।

डॉक्टरों की कमी है पैरामेडिकल वर्कर्स हजारों की संख्या में बेरोजगार के रूप में दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर है।

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